অভাগা যেদিকে চায়, সাগর শুকায়ে যায় (আমার মেডিকেল কলেজ জীবন-৭)

আমাদের দেশের সরকারী মেডিকেল কলেজগুলোতে ছাত্র সংসদ আছে। বেসরকারী মেডিকেল কলেজগুলোতে এই ব্যবস্থা নেই। তবে আমাদের জহুরুল ইসলাম মেডিকেল কলেজে তিনটি ছাত্র কমিটি ছিলো- দ্যুতি (ম্যাগাজিন কমিটি), সঞ্চালন (সন্ধানী-এর মতো) এবং ডাইনিং কমিটি। প্রতি ব্যাচ থেকে ছাত্র-ছাত্রীরা এসব কমিটিতে থাকতো, তবে তা নির্বাচিত হতো না, কলেজ কর্তৃপক্ষ নিযুক্ত করতো।

কিন্তু আমাদের সময় দ্যুতির বেলায় একটু ব্যতিক্রম হলো। একদিন এমএন স্যার ক্লাসে এসে বললেন, ‘তোমাদের মধ্যে কে কে দ্যুতিতে আসতে চাও?’ আমাদের ব্যাচ থেকে একটি ছেলে ও একটি মেয়ে আসতে পারবে। মেয়েদের মধ্যে থেকে সর্বসম্মতভাবে সাদিয়ার নাম উত্থাপন করায় কলেজ কর্তৃপক্ষ তাকেই নিযুক্ত করলো। সমস্যা হলো ছেলেদের মধ্যে থেকে। কেউ কেউ আমার নাম প্রস্তাব করে, আবার কেউ কেউ তানভীর নামে আমাদের আরেক বন্ধুকে সমর্থন দেয়। এমএন স্যারের হঠাৎ করে কি মনে হলো জানি না, উনি বললেন তোমাদের মধ্যে কে কে তানভীরকে সমর্থন করো, হাত তুলো। অর্ধেক ছেলে এবং এক-তৃ্তীয়াংশ মেয়ে হাত তুললো। আমার সময় দেখা গেলো, বাকী অর্ধেক ছেলে আর দুই-তৃ্তীয়াংশ মেয়ে আমাকে সমর্থন দিলো। আমি মেয়েদের জন্যই দ্যুতির কমিটিতে চলে আসলাম। এখনো জানি না, কিভাবে আমি এত মেয়ের সমর্থন পেলাম। সঞ্চালনে আমাদের ব্যাচ থেকে গিয়েছিলো ফয়েজ, আর ডাইনিং কমিটিতে ছিলো, যতদূর মনে পড়ে চয়ন, সম্ভবত সাথে ফয়েজও ছিলো।

ফার্স্ট ইয়ারের শেষের দিকে আমাদের আন্তঃবর্ষ ফুটবল প্রতিযোগিতা শুরু হলো। প্রথমেই আমরা বিভক্ত হয়ে গেলাম ক্যাপ্টেন নির্বাচন নিয়ে। শেষ পর্যন্ত গোপন ভোটাভুটির মাধ্যমে এখানেও ক্যাপ্টেন নির্বাচিত হলো ফয়েজ। আমি মনে মনে খুব খুশী হলাম, যা হোক রুমমেট ক্যাপ্টেন হওয়ায় দলে জায়গা নিশ্চিত! ফয়েজকে বললাম আমি গোলকিপার পজিশনে খেলবো। ফয়েজ একটু অবাক হলো, কারণ আমি অনেক পাওয়ারের চশমা পরি। তারপরও রুমমেট বলে কথা। গোলকিপার পজিশনেই প্রাকটিশ করতে লাগলাম। দলের ম্যানেজার হলো বাবু আর ফিজিওথেরাপিস্ট হিসেবে আশিক থাকলো আমাদের সাথে।

আমাদের দল গঠন নিয়ে খুব বেগ পেতে হয়েছিলো। যারা যারা খেলতে ইচ্ছুক ছিলো, তাদেরকে নিয়ে সকাল-বিকাল দুইবেলা প্রাকটিশ করতাম। আর মেয়েরা প্রতিদিন খেলার মাঠে বিভিন্ন ধরনের খাবার, পানি, স্যালাইন, জুস নিয়ে আসতো। তাই যারা খেলা পারতো না, তারা খাবারের জন্যই মাঠে যেতো। অবশেষে আমরা একটা দল দাঁড়া করাতে পারলাম। কিন্তু প্রাকটিশ ম্যাচেই আমাদের নির্ভরযোগ্য এক খেলোয়াড় আল-আমীনের ডান হাঁটুর লিগামেন্ট ছিঁড়ে গেলো। যদিও সব প্রাকটিশ ম্যাচগুলো জিতে প্রাক-টুনার্মেন্ট আমরাই ফেভারিটে পরিণত হলাম আর আমাদের ক্যাপ্টেন ফয়েজের দুর্দান্ত পারফরমেন্স অন্য সব ব্যাচের মাথা ব্যথার কারণ হলো।

মৌরিন অধ্যায়ের সমাপ্তির পর আমরা চারবন্ধু আমি, ফয়েজ, মাসুদ আর মনোয়ার একটা মজার কাজ করলাম। দিনাজপুর মেডিকেল কলেজে আমার খুব ঘনিষ্ঠ স্কুল বন্ধুর বড় বোন পড়তো। তাঁর ঠিকানায় আমরা চিঠি লিখলাম, “হৃদয় খালি আছে। কেউ যদি কোনো হৃদয় পেতে চান অতিসত্ত্বর নিচের ঠিকানায় যোগাযোগ করুন”। আপু আমাদের বিজ্ঞাপনটা তাঁদের ক্যাম্পাসে ছড়িয়ে দিলো। একসাথে অনেকগুলো চিঠি পেলাম। খুব মজার মজার চিঠি। এদের মধ্যে একজনের চিঠি খুব ভালো লেগে গেলো, রিতা (এই নামটা খুব স্বাভাবিকভাবেই ছদ্ম নাম)। রিতা, আমার জীবনের প্রথম পত্রমিতা। দুর্মুখেরা বলতে লাগলো নিজের কলেজে ভাত না পেয়ে অন্য জায়গায় হাত বাড়িয়েছি। এই রকম অবস্থাতেই আমাদের ফুটবল টুর্নামেন্টের প্রথম খেলা শুরু হলো।

অবাক কান্ড! খেলতে গিয়ে দেখি আমি গোলকিপার নই! আবারো এখানে ববি! ফয়েজ আমাকে সান্তনা দিলো অন্ততপক্ষে না খেলেও একটা খেলার পোশাকতো পাবো! সেই বছর আমার ফুটবল খেলার সমাপ্তি সেখানেই। পুরো টুনার্মেন্টে আমাদের ব্যাচ ভালো খেলেও আমরা ফাইনালে যেতে পারি নি। আমি অবশ্য কাউকেও বলতে পারি নি আমি না থাকাতে আমরা ফাইনালে যেতে পারি নি, কারণ টুর্নামেন্টের সেরা গোলকিপার হয়েছিলো ববি!

ফুটবল টুনার্মেন্টের পরেই পিকনিকের আয়োজন শুরু হলো। অনেক মিটিং-এর পর ঠিক হলো আমরা সবাই কক্সবাজারে যাবো। আমাদের পিকনিক হতো ব্যাচ ভিত্তিক, সময়কাল ছিলো তিন থেকে চার দিন। প্রতি ব্যাচের সাথে দুই-তিনজন করে স্যার-ম্যাডামরা যেতেন। প্রতিটি ব্যাচের পিকনিকগুলোর মধ্যে সবচেয়ে বেশী উত্তেজনাপূর্ণ হতো ফার্স্ট ইয়ারের পিকনিকটা। কারণ এই পিকনিকের সময়টাতেই অনেক উইকেট ভাঙ্গতো। আর এই উইকেট ভাঙ্গার সুবিধার জন্যই সবসময় জায়গা হিসেবে কক্সবাজার অগ্রাধিকার পেতো। বিশাল সাগরের তীরে সবার মনটাও বিশাল হয়ে যেতো, কেউ আর কাউকে না বলতে পারতো না। পিকনিকের আয়োজন যখন মাঝপথে, কারণটা আমার ঠিক মনে নেই, পিকনিক হওয়া নিয়েই সমস্যা দেখা দিলো। প্রিন্সিপাল স্যার আমাদেরকে পিকনিকে যাবার অনুমতি দিতে চাইলেন না।

আমি মনে মনে খুব খুশিই হয়েছিলাম! একেতো ববি আমার একিলিস হীল সবাইকে ফাঁস করে দিয়েছিলো, তার উপর পত্রমিতা কাহিনীতে আমার আর উইকেট নেওয়ার কোনো সম্ভাবনাই ছিলো না। (এখনো সেই সব দিনের কথা মনে পড়লে খুব মজা পাই, মনের অজান্তেই হেসে উঠি।) আমি যখন মোটামুটি নিশ্চিত হলাম পিকনিক আর হবে না, একা একা জীবনে প্রথম বারের মতো চলে গেলাম দিনাজপুরে, ঘুড়ে বেড়াতে। যেদিন দিনাজপুর পৌঁছালাম, সেদিনই খবর পেলাম পিকনিক জট খুলে গেছে, সবাই পিকনিকে যাচ্ছে! একেই বোধহয় বলে, অভাগা যেদিকে চায়, সাগর শুকায়ে যায়!

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11 thoughts on “অভাগা যেদিকে চায়, সাগর শুকায়ে যায় (আমার মেডিকেল কলেজ জীবন-৭)

  1. ভালো হয়েছে…চালিয়ে যান।নেশা নেশা লাগছে….।

  2. মনো, তোর কমেন্ট পড়ে মাইন্ড করার কোনই কারণ নেই। আমি আসলেই খুব এনজয় করছি।
    আর সবচেয়ে বড় কথা, এটা কোনো আ্ত্মজীবনী নয়, স্মৃতিচারণের আদলে সাহিত্য রচনা। আমার যেটুকূ মনে আছে, তাই লিখছি-শধু আমার ব্যাপার আর যাদের প্রতি আমার আস্থা আছে যে তাদেরকে নিয়ে লিখলে মানহানির মামলায় পড়তে হবে না (যে্মনঃ তুই, ফয়েজ, মাসুদ), তাদেরকে নিয়েই লিখছি, অন্যসব ব্যাপার এড়িয়ে যাচ্ছি। এজন্য হয়তোবা কিছু জিনিস অসম্পূর্ণ মনে হচ্ছে।

    খুব খুব ভালো থাকিস, আর যে সব লেখাতে কমেন্ট করিস নাই, সেগুলোতেও কমেন্ট কর।

    • “Man-hani” ak complicated topics.
      Ami amke na, tor bepare chinta hoy.
      Na jani amar lekhai man-hani mamlai porbo kina?
      Niaz, ja lekar ta sobi lekh. Hesitate koris na.
      Jodi karo nam nite problem mone hoy to chod-do nam nibi.
      Kintu please o-shompurno kotha likish na.

  3. @ Foyez, tor lekha dekhe atoi moja pelam je ami Niaz-ke akta kora reply dewar kotha chepe gelam.
    @ Niaz, tui bhabtesis keno ami kora kotha likbo?
    Karon, tui onek chapa martesis ja limit cross kore jac-ce.
    1st ami tor akta prosner answer dai. Foyez, tui mind koris na. Tor nam nite holo.
    Tui jante cheye cili kivave ato meyder somorton pali?
    Tui selected hoyecili Foyezer jonno.
    Karon tojkon Foyez-er B grouper 8-10 jon mayer ak group cilo, jekane o cilo head, r Tonny cilo tar bow (funny bepar holo sai group-e tar maye cilo Lima!, Sharmin! r maybe Happy,Lucky,Joya cilo tar bhon!)
    Dhoti-r selection-er din Foyez tor bepare amader A batch-er mayder-ke raji koralo, jar fole Foyez-er group r amader mayeder vhote tui selected holi.
    2nd tor Dinajpurer ghoto-nar bepare.
    Mojar beparta tui,Riad r Masud ghotiecili. Tui amar nam na jig-gesh kore diecili. Tokon-kar somoi mejaj kharap hoye giecilo, tobe mejaj-ta pore aro kharap holo jokon may-ra Riad-ke like korlo. Kunu interest na thaka sotteo ai beparta cilo irritating.
    3rd tor picnic jawa niye.
    Tui protomei raji cili na, karon picnic-er agei tui friend-er niye ghore giecili. R Dinajpure keno giecili tato tui bhalo janish. Kintu ami bujlam na tui tahole ki mone kore 3rd year picnic-e gali?
    3rd tor Mourin od-dai niye.
    Ai bepar-ta ak orte False.
    Keno? Karon
    1) Tui Achilles’ Heel(AH) e bolesis je Boby tor AH khuje payese! Tor ager akta affair cilo, ata tui nijei sobai-ke bolecili.
    2) Boby Mourin-ke protomaye choice koresilo, ata sobai janto. Sekhane tui oke Mourin-er bepare help chaili, topic-ta to surutei weak hoye galo.
    3) Tui suru-te kake target korecili tato amra jani, nam bolbo na. Amon-ki arekjonte target kore voice sune palie gali seta-ki bhule gali?
    4) Amader picnic hotecilo prai 6 mash por. Nobin-boron hoyecilo 1 mash por. Tui tahole bolte chas je tui ai 6 mash Mourin-er birohe cili!
    5) Picnic-er age tor jobone onek ghotona ghotecilo! Tar poro tui kivave Mourin-er birohe thakli bujlam na.
    6) Atao bujlam na jake tui atao like koros boltesis sai tar nam kore tui kivave ak sinior bhai-ke khosiecili!
    Niaz, mind korish na.
    Kron protomdike tui onek immature,faltu target korecili, ja nitantoi hujuge.
    Tor mone ata niye kunu dhuk-ko cilo na, karon tui serious cili-na.
    Kintu ai rokom faltu bepar niye tui nijeke aro light kortesis atei amar aapor-ti.

    • মনো, তোর এত বড় কমেন্টের জবাব দেবার সাহস আমার নেই। খুব খুশি হচ্ছি এত এত ইন্টার একশন দেখে।

      নিয়াজ, লেখা চালিয়ে যাও।

      মনো আর ফয়েজ, মন্তব্য করে যাও।

      • Niaz,
        Ami arekta boro response liktesilam.
        Bhoi nai, bhalo kothai likcilam.
        Kintu jokoni post korte giesilam tokon-i net chole galo.
        Tar por jokon open holo deklam lekha send hoyni, r ami save korini.
        Tor reply porlam. Asole bepar holo tui amar close friend.
        Tai jokon tui nijei nijeke pochascili, tokon amar bhalo lageni.
        Amar lekhate jodi mind korish tahole ami sorry.

  4. Asolei niaz tui jedike takash, somudro sukie jaw r moruvumi te rup nay. tui jeibar drutir jonno mononito holi sei bar theke druti bondho hoye gelo. na tor jonno na , sombhoboto tele sekhane takia silo. but drutir jonno amader batche tor protidondi thakar kotha noy, karon tor ei lekha gulo tar e proman. tor mullo keu tokhn na bujhleo akhn sobai bughtese. amader omullo roton Niaz moula.

    Football e toke nile amar mone hoy amrai 1st year e champion hotam. tar result ta 4th yaer e pelam. amra champion holam jekhane tor vumika chilo anek. tui sili amar team er trum card.

    dinajpur medical e kobe chithi likhli. amake abar er moddhe tansis keno? tora ki korsis tora janos. amar sathe to faridpur medical er shovar sathe kotha hoto. se o tor jonno. tor proxy ditam. r sei jonno anek suffer korte hoyeche. vule gesis.

    tui picnic e jas ni keno ? tor to wicket porar sombhabona silo. ja ami r monowar jantam. kar sathe bolbo naki? se r keu na.. amader j8 batcher meye…. amader prio ..tor janer tukro …….jar kotha vebe tui rater por rat ghumate parti na…… jar jonno tui roza rekhesili…… jar namer 1st letter L/S/M/T .. je toke proposed koresilo r tui 1 week somoy cheyesili.. thak bollam na. or akhn bie hoye gese sathe tor o hoyeche. mone porse sei diner kotha. tui asolei ovaga sili je lisake bier por vaggoban hoyesis.

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